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उसकी आँखों में रहते हैं बुरास / कुमार कृष्ण

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वह आदमी
काशी की धोती पहनकर
सीढ़ियों के शहर में आया
और बुरास के जंगलों में
रिश्तों के बीज बोकर
विलायती पतलून पहनकर लौट गया
वह शायद नहीं बनना चाहता था
पूरी तरह विलायती बाबू
इसीलिए लौट गया गंगा के पास
वही गंगा
जो मेरे पहाड़ की रिस्ती हुई तकलीफ़ है
पहाड़ पर
सिर्फ पहाड़ पर ही होते हैं
नदियों के घर
वह शख़्स शायद भूल चुका है पूरी तरह
नारकण्डा कि धुंध
पर शायद नहीं भुला पाया
टेनिस कोर्ट में गुजारे दिन
वह बो गया आलोचना के बीज शब्द
छुपा गया किसी खेल की तरह
पहाड़ी ज़मीन पर
साहित्य का समाजशास्त्र
वह सौंप गया
कविता को धार देने वाले अनगिनत औजार।