उसको फुर्सत ही नहीं वक़्त निकाले मोहसिन
ऐसे होते हैं भला चाहने वाले मोहसिन
याद की दश्त में फिरता हूँ मैं नंगे पांव
देख तो आ के कभी पांव के छाले मोहसिन
खो गई सुबह की उम्मीद और अब लगता है
हम नहीं होंगे कि जब होंगे उजाले मोहसिन
वो जो इक शख्स मता-ए-दिल-ओ-जान था
न रहा
अब भला कौन मेरे दर्द संभाले मोहसिन