भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

उस कच्चे रास्ते पर ... / संध्या गुप्ता

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

एक शून्य सा फैला है
कुछ मटमैला... कुछ धूसर
...टील्हे खाई पत्थर
अटके पानी और
कटरंगनी की झाड़ियों के बीच
देसी दारु की गंध में लिपटा
उस कच्चे रास्ते पर ...

उस पार बस्ती है मगर
वह एक द्वीप है
कच्चे रास्तों से घिरा

पहाड़ टूटते हैं और हाईवे पर बिछते हैं
कच्चे रास्तों से कच्चे माल गुजरते हैं

फसल पकती है
फल पकते हैं
आदमी पकता है
मगर ताज्जुब है...
वह रास्ता नहीं पकता !!

पाँच हजार साल पहले
यहाँ क्या था?... नहीं पता...
लेकिन अभी एक समाज है
ऊपर -नीचे दाँयें-बाँयें से एक-सा
केंदुआ... चैकुंदा... बांदा... डकैता
...डुबाटोला... मुरीडीह... मातुडीह...
सरीखा कुछ नाम हो सकता है उसका

वह देश-प्रेम के जज़्बे में कभी नहीं डूबा
मातृभूमि के लिये शीश झुकाना
उसके मन के किसी धरातल पर नहीं
अपना देश क्या है
...उसके अवचेतन में भी नहीं

यह दुनिया एक अजायबघर है उसके लिये
तिलिस्मों से भरी

...किन्तु हमारी भूख मिटाने और हमारा जीवन
चमकाने में उसकी अहम भूमिका है

कोई पुरातत्ववेत्ता, खगोलशास्त्री या वास्तुविद्
नहीं गुज़रा कभी उस कच्चे रास्ते पर
उसकी ऐतिहासिक - भौगोलिक स्थिति में
किसी को कोई दिलचस्पी नहीं

वहाँ कोई महाराणाप्रताप या वीरप्पन पैदा नहीं हुआ
कोई जादूगर या मदारी तक नहीं
उस भूखण्ड के नीचे
कितना सोना... कितना हीरा... दबा है
किसी को नहीं मालूम

हो सकता है...किसी दिन... या रात ...
कोई सुषुप्त ज्वालामुखी भड़क उठे
और एकाएक सबका ध्यान
अपनी ओर आकर्षित कर ले
करवट बदलता... पेट के बल रेंगता
... घुटनों पर उठता
वह कच्चा रास्ता ...