भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

ऊधो अखना पखना जलते / आनन्दी सहाय शुक्ल

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

ऊधो अखना पखना जलते ।
वन पाँखी की नुची लोथ पर वहशी बिम्ब मचलते ।।

लाल लाल अंगारे सुलगें
दीर्घ अँगीठी दहकें
कोरस गाएँ कबीले नाचें
मद डगमग पग बहकें
सींक कबाब भोज का मीनू कला-कुशल कर तलते ।।

पत्थर की बुनियादों पर ये
लोहे की सन्तानें
शहर जगमगे मनु के मन का
दर्द न बिल्कुल जानें
आबादी के सुरसा जंगल सब कुछ चले निगलते ।।

हानि-लाभ पर निर्भर रिश्ते
साँसों के बेपारी
क्रूर व्यवस्था के जबड़ों में
जीवन पान सुपारी
घर आँगन मरघट के रूपक ऐसे मूल्य बदलते ।।