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ऊधो इस युग में क्या गाएँ / आनन्दी सहाय शुक्ल

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ऊधो इस युग में क्या गाएँ।
औरंगजेब अयातुल्ला ये गाता कण्ठ दबाएँ।।

हथकड़ियाँ बेड़ी औ’ कोड़े
दुर्लभ तोहफ़े पाएँ
छन्द गीत के हत्यारे अब
रचनाकार कहाएँ

राजनीति के तलुवे चाटें
कीर्ति-किरीट लगाएँ
जीवन-दर्शन बहस चलाना
मुद्दे रोज़ उठाएँ

जिह्वशूर बुद्धिजीवी ये
संस्कृति पार लगाएँ
गाते-गाते मरे निराला
पागल ही कहलाएँ

सुविधाजीवी छद्म-मुखौटे
मठाधीश बन जाएँ
भूखा बचपन तृषित जवानी
तन-मन बलि समिधाएँ

छुप-अनछुए दर्द-द्रवित हैं
कातर प्राण नहाएँ
चारों ओर ठगों के डेरे इनसे गाँठ बचाएँ ।।