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ऊधो सफ़र बड़ा रेतीला / आनन्दी सहाय शुक्ल

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ऊधो सफर बड़ा रेतीला ।।
घिस घुटनों तक पाँव रह गए, मरु की दारुण लीला ।।

हर बढ़ते पग के आगे
आड़े आया टीला
गिरते पड़ते पार किया तो
बदन पड़ गया ढीला
चक्रव्यूह टीलों का दुर्धर
ऊपर रवि चमकीला ।

रात न आती चाँद न उगता
केवल दिवस हठीला
रक्तवाहिनी नस में बहता
पावक तरल पनीला
ऊपर आगी नीचे आगी
सब कुछ रत्किम पीला
पड़े-पड़े असहाय देखता गड़ा वक्ष में कीला ।।