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ऋतुपर्णा तुम आज भी नहीं आई / विजेंद्र एस विज

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आज कुछ
धुँधली पड़ गई लकीरों को
फिर से गाढा किया
उन पर कुछ रंग फेंके
लाल हरे नीले सफेद
अब
कैनवस का कोई हिस्सा
खाली नहीं रहा
बड़ी खामोशी के साथ
उन फैले पड़े रंगों को
घंटो निहारता रहा
अचानक,
गाढ़ी पड़ चुकी लकीरें
अब अस्पष्ट नज़र आने लगी / अस्पष्ट
और फिर,
पूरा का पूरा कैनवास खाली
बिल्कुल सफेद
जैसे कभी वहा रंग थे ही नहीं.. / वहाँ

फ़ीकी पड़ चुकी लकीरें
अब शब्दों में तब्दील हो गई
हाँ..यही शब्द तो थे
ऋतुपर्णा तुम आज भी नहीं आयी!