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एक अर्जुन मैं भी / विजय कुमार पंत

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हे कृष्ण
तुमको सत्-सत् प्रणाम कहता हूँ
कुछ मेरी व्यथा भी हरो नाथ
मैं भी बहुत व्यथित और विचलित हूँ
मैं भी अर्जुन हूँ
जिसका कोई रथ नहीं
कोई सारथी नहीं
जिसके पास न तो गांडीव है
न ही भीष्म पितामह और
न विदुर काका कहीं
मेरे पास न तो पांच महाबली भाई है
न ही मैंने द्रौपदी, सुभद्रा जैसी पत्नी पाई है
न ही मैंने इन्द्र और देवताओं से
वरदान लिए है
न ही आपने मुझे गुरु द्रोण दिए है
मुझे महयोद्हायों के बिना
अकेले आपने खड़ा कर दिया है
इस पार
नज़र उठा कर देखो मधुसुदन
क्या क्या खड़ा हैं मेरे सामने
मुझसे युद्घ करने को तत्पर और तैयार
उस पार...