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एक और कृत्य / मोना गुलाटी

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बौने कन्धों पर चढ़कर मैंने
खोंट दिए हैं तीर हब्शी आँखों में
और छितरा दिए हैं बाल तैरती हवा में !

अब चण्डालों और भिक्षुणियों का भेष मुझे
तृप्ति देता है।

बदन पर रेंगते हैं असंख्य कीड़े और स्पर्श
ज्वालाओं में भभकने और कूदने से आग
नहीं समाप्त होती
एक कुलटा हंसी
हवा को चीरती दूर तक अट्टहास फैलाती है ।

इतनी नपुंसक और दग्भ शताब्दी को फोड़ने के लिए
मैंने तोड़ दिए हैं अण्डों के छिलके और छितरा दिए हैं
नरमुण्ड ।
बुभुक्षा से फैलने लगी हैं जिह्वाएँ लपलपाती हुई
अन्तरिक्ष तक ।

एक अट्टहास के खण्डहर में कूद गया है दुबका हुआ
देश और इतिहास और चूहा
और एक खाल मुक्ति की संज्ञा बनकर लटक गया है
आकाश में ।

मेरे कन्धों पर चिपकने लगे हैं निर्वासित आत्माओं के
पापजन्य कृत्य ।
मैंने निरर्थक हवा में सांस लेना छोड़ दिया है और एक
विवर के नीचे भागती रही हूँ अपनी पदचाप की
खोज में ।

ठिठककर खड़े होने से अब आवाज़ें नहीं आतीं

मैंने जान लिया है
पूरी शताब्दी में एक और कृत्य हुआ है
हत्या का !
और अट्टहासकर तोड़ दी है
दीवारें।
मैं कूद गई हूँ निर्वात के विशाल डैनों को काटकर ।
लक्ष्यहीन दौड़ में आगे निकल जाने के लिए
नोंच लिए हैं रोम
और तपते रक्त के साथ
जिह्वा का स्वाद पीने लगी हूँ !