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एक गीत हर दग्ध हृदय में / केदारनाथ मिश्र ‘प्रभात’

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चिह्न रक्त के मिले जहां भी
मारुत धोता रहा रात-भर

मानव-मन के अंतरतम में
समर छिड़ा जो, नया नहीं है
हिंस्र वन्य पशु-सा आ बैठा
अंधकार जो, गया नहीं है

तारों को नीचे उतार कर
सागर रोता रहा रात-भर

मृत-सा पड़े पंक्ति में पर्वत
मृत-सा खड़े वृवक्ष, पथ निर्जन
मृत-सा फूल खिले डालों पर
यह भी एक अनोखा सिरजन

एक गीत हर दग्ध हृदय में
सपने बोता रहा रात-भर।