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एक नदी सूख गयी / हरीशचन्द्र पाण्डे

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‘देखो यह नदी सूख गयी’
अपनी तर्जनी बस से बाहर के दृश्यों की ओर दिखाते उसने कहा

नदी सचमुच सूख गयी थी
अभी पिछले वर्ष तक पानी था इसमें

थी भी बहुत छोटी नदी यह
देश क्या प्रान्त क्या ज़िले के मानचित्र में भी
इस नाम की कोई पतली नीली लकीर नहीं थी

लेकिन थी तो ज़रूर
आगे चलकर एक बड़ी नदी की सहायक नदी से मिल जाती रही थी
वहाँ पर लग जाता रहा सौ-पचास लोगों का मेला

जैसी स्थानीय थी
इसके सूख जाने का असर भी स्थानीय है अभी
किसी बड़ी चीज़ से इसके सूखने को जोड़ेंगे तो हँसेंगे लोग अभी

अभी तो यह फूले गुब्बारे के बाहर रखी
एक सुई है

इसे अभी देख पा रहा है केवल एक पुल
जो बड़ा धोखा खा गये आदमी की तरह खड़ा है
अवाक्!