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एक नीम-मंजरी / रामदरश मिश्र

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एक नीम-मंजरी
मेरे आँगन झरी
काँप रहे लोहे के द्वार।

आज गगन मेरे घर झुक गया
भटका-सा मेघ यहाँ रुक गया
रग-रग में थरथरी
सन्नाटा आज री
रहा मुझे नाम ले पुकार।

एक बूँद में समुद्र अँट गया
एक निमिष में समय सिमट गया
वायु-वायु बावरी
किसकी है भाँवरी
साँस-साँस बन रही फुहार।