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एक पत्र: महामहिम के नाम / विनोद शर्मा

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महामहिम
आखिर आप सत्त के इस सर्वोच्च शिखर पर
पहुंच ही गए, बधाई
आप यहां कैसे पहुंचे?
इस प्रश्न की आड़ में, मैं आपकी योग्यता
और नीयत पर संदेह करने की गुस्ताखी
नहीं करूंगा क्योंकि कल ही प्रेस-कॉन्फ्रेंस में
आप ने कहा था कि आप महात्मा गांधी के
सच्चे अनुयायी हैं और नैतिकता तथा
‘साध्य’ और ‘साधन’ की पवित्रता में विश्वास रखते हैं।

फिर भी, इस शिखर पर
जो दिव्यऔर अभिमंत्रित स्वर्णिम सिंहासन रखा हुआ है
उस पर बैठने से पहले आप खुद से
ये पांच सवाल अवश्य पूछें
और अपने दिल से मिले जवाब
यदि आपको सही लगें
तो आप इस सिंहासन पर बैठें
वरना हो सकता है कि कुछ समय के बाद
आप अपना मानसिक संतुलन खो बैठें
और प्रलोभनों के शिकार होकर
स्वर्गाधिपति नहुष की तरह शापग्रस्त हो जाएं-
1. इस सिंहासन पर बैठना आपका सौभाग्य है मगर, कहीं देश का दुर्भाग्य तो नहीं?
2. इस सिंहासन से जुड़े दायित्वों को निभाने में आप सक्षम हैं या नहीं?
3. क्या आप युद्ध में जीतने या शत्रु को परास्त करने की योजना बनाते समय नैतिकता की कम से कम क्षति होने की संभावना को उसके केन्द्र में रखते हैं?
4. क्या आप अपनी महत्त्वाकांक्षाओं और जन कल्याण की अपनी भावनाओं के बीच संतुलन रखने में विश्वास करते हैं?
5. क्या आप यह मानते हैं कि जो आप समझते हैं और जो आप कहते हैं, वही अंतिम सत्य है?
इस उम्मीद से कि आप
मेरी सदाशयता पर संदेह नहीं करेंगे,
शुभकामनाओं सहित,
आपका प्रशंसक-
विनोद शर्मा।