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एक बार तुम खो दो अपनी आवाज़ / नीलोत्पल

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तुम खोल लो अपनी बाँहें
और बीत जाने दो बारिश

देखो, पेड़ के भीतर उतर रही चिड़िया
कितनी शान्त और सहज है
वह धूप की स्याही से लिखती है एक पँक्ति
जो हमें नहीं दिखती
बड़े मज़े से वह गुनगुनाती है
पेड़ और नदी एक साथ बहते हैं

पहाड़ एक फूल चुनता है
आसमान एक बादल
दोनों झर जाते हैं वृहत्तर साँझ के लिए

एक बार तुम खो दो अपनी आवाज़
भूल जाओ पहनावे,
वे भटकाव जो चुने थे जीवन की ख़ातिर

आहिस्ते-आहिस्ते रख दो
अशान्त पत्तियों पर अपनी नींद

तुम्हारी मुलाकात उन चिडियों से
जिन्होंने तुम्हारे लिए घोंसले बनाए

वे फूल, वे बादल जो रोपे गए
झरने के बाद तुम्हारे सपनों में

सुनो बारिश जारी है....
क्या तुमने खोल लिए हैं दरवाज़े
जो स्वर्ग की तरफ नहीं
खुलते हैं जंगलों की अनगढ़ सुबहों में