भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
  रंगोली
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार
Roman

एक बार हम गएन बंबई नौकरी कीन्हा तीन / अवधी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

   ♦   रचनाकार: अज्ञात

एक बार हम गएन बंबई नौकरी कीन्हा तीन
दुई ठो छोड-छाड़ दीन एक ठो कईबई नाहीं कीन

जवन कईबई नहीं कीन वोहमें मिला रुपैया तीन
दुई तो फाट-फूट गै एक ठो चलबै नाहीं कीन

जवन चलबै नाहीं कीन ओसे गाँव बसावा तीन
दुई तो उजरि पुजरि गै एक ठो बसबई नाहीं कीन

जवन बसबई नाहीं कीन ओहमें कोहार बसावा तीन
दुई तो मरी-खपि गै एक ठो अईबई नाहीं कीन

जवन अईबई नाहीं कीन उहै हांडी पकावा तीन
दुई तो फूट-फाट गै एक ठो पकबई नाहीं कीन

जवन पकबई नाहीं कीन ओहमें चाउर पकावा तीन
दुई तो जर-भुनि गै एक ठो भबई नहीं कीन

जवन भबे नाहीं कीन ओहमें पंडित खियावा तीन
दुई तो भाग-भूग गै एक ठो अईबई नहीं कीन

जवन अईबई नहीं कीन ओके मारा लाठी तीन
दुई तो ऐहमुर-ओहमुर परि गै एक ठो लगबै नाहीं कीन

जवन लगबै नाहीं कीन ओह्पे चला मुकदमा तीन
दुई तो छूट छाट गै एक में पेशिअई नहीं दीन

जवन पेशिअई नहीं दीन ओहमें सजा भई तीन
दुई तो भूलि - भालि गए एकठो कटिबई नहीं कीन

जवन कटिबई नहीं कीन ओहमें साल लगे तीन
दुई तो पुरान - धुरान रहे एक ठो गिनिबई नहीं कीन

जवन गिनिबई नहीं कीन ओहमें कविता कहा तीन
दुई तो हेरा - हुरू गईं एक ठो यदिही नहीं कीन !!