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एक भी मिसरा सुबह की धूप से कमतर नहीं / विनय कुमार

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एक भी मिसरा सुबह की धूप से कमतर नहीं।
यह ग़ज़ल की रात जिसमें रात रत्ती भर नहीं।

चांद के रोडे़, सुहानी चांदनी की चिंदियाँ
अब ग़ज़ल के ख़्वाब में भी ख़्वाब सा मंज़र नहीं।

टूटने के दौर में भी टूटने से बच गई
मुतमइन हूँ अब ग़ज़ल के टूटने का डर नहीं।

एक भी मुद्दा न छोडे़गी, न छोड़ेगी ज़मीन
खुल गए हैं पाँव तो कुछ हाथ के बाहर नहीं।

मारती हैं साँप, पत्थर तोड़ती हैं लड़कियाँ
भेडियों के सामना में आपसे कमतर नहीं।

काम करते हैं किसी दरबार में जाते नहीं
ये फ़क़त ग़ज़ले नहीं है मैं फ़क़त शायर नहीं।

मैं सुनाकर ही रहूँगा वक़्त चाहे जो लगे
सिर्फ कहने के लिए सरकार ये तेवर नहीं।

जो ग़ज़ल पढ़ते नहीं उन तक तुम्हारी हो रसूख़
अब करोड़ों घर तुम्हारे मैं तुम्हारा घर नहीं।