भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
एक लड़की चल रही है हाथ थामे हाथ में / प्रमोद तिवारी
Kavita Kosh से
मुस्कराती
गुनगुनाती
ज़िन्दगी के साथ में
एक लड़की
चल रही है
हाथ थामे हाथ में
वो कभी गोरी
कभी काली
कभी है सांवली
वो कभी भोली
कभी अल्हड़
कभी है बावली
वो कभी दिल में
महकती है
कभी जज़्बात में
मत समझ लेना उसे
कोई अनूठी हूर है
या कि चंदा की
बरसती
चांदनी का
नूर है
वो अकेले भीगती
छत पर खड़ी
बरसात में
सर पे रहती है
हमेशा
एक बदली की तरह
घूमती फिरती है पीछे
एक पगली की तरह
और फिर वो
रूठ जाती है
ज़रा सी बात में
आंख खोलूं
भोर में
फूलों सा
खिल जाती है वो
शाम को लौटूं
तो दरवाजे पे
मिल जाती हैवो
और फिर
तकिये पे सूरज
टांकती है
रात में