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एक शहर का ज़िन्दा होना / सीमा संगसार

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एक शहर
ज़िन्दा होता है
दम खींचते हुए
उन बूढ़े रिक्सेवालों से
जो रखते हैं
पाई–पाई का हिसाब
अपनी साँसों का...
उनके काले मटमैले हाथों में
होता है शहर भर का नक्शा
जिसमे रहते हैं
खेत–खलिहान / नदी–नाले
और उन गलियों के पते
जिन्हें लोग जानते हैं
अपने ही ठिकाने से...
शहर की गलियों और चौराहों के नाम
इनकी हथेलियों पर
खैनी चूने की तरह जमी होती है
जिन्हें ये चुटकियों में भरकर
दबा लेते हैं
मुंह के एक किनारे पर...
एक शहर
सुनसान होता है
जब होती है
हत्याएँ, अपहरण और लूटपाट
भीड़ उग्र से उग्रतर होती जाती है
बंद हो जाती है दुकानें और बाज़ार...
एक शहर
ज़िंदा होता है तब भी
उन रिक्शे की पहियों के घूमने के घुमते रहने से!
कि नहीं हुआ करती है
हत्याएँ
एक रिक्शे वाले की...