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ऐ लड़की ! / संजय शाण्डिल्य

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ऐ लड़की, सुनो !
वहाँ
सबसे अलग
अपने एकान्त में खोया
जो बैठा हुआ है लड़का
उसकी तरफ़ कभी मत जाना तुम
उसकी आँखों का समुद्र
तुम्हें खींच लेगा अपनी गहराई में

हो सकता है
कभी अचानक ही वह उठे
और तुम्हारे द्वार से होकर गुज़रने लगे
तो सुनो
एकदम से भागकर तुम
घर के पिछवाड़े चली जाना
उसे झाँकना भी मत कहीं से
कि उसकी चाल में
असंख्य कामदेवों की चाल है
असम्भव है जिसकी मादकता से बच पाना

यह भी हो सकता है
कि किसी रोज़
किसी बहाने तुम्हारे द्वार पर
वह आ जाए
मसलन
कि वह तुम्हारे भाई से मिलने आया है
कि वह तुम्हारे मरणासन्न दादाजी को
गाकर सुनाने आया है रामचरितमानस
कि तुम्हारी दादी के गहनतम दुख में
शामिल होने आया है वह
कि तुम्हारे माता-पिता का विश्वास बनकर वह आया है
कि वह आया है
ज्ञान की अपार प्रकाश-राशि से तुम्हें नहलाने
तुम्हें जीवन की हर बाधा पार कराने वह आया है
पर सुनो
वह तुम्हें केवल बहलाने आएगा
उसके भुलावे में कभी मत आना
वह तुम्हें हर रंग का सपना देगा
जपने को नाम केवल अपना देगा
वह मायावी है – मायावी
जादूगर है भाषाओं का
उसकी छाया से भी बचना
कि जब कहीं वह जाता है
गाड़ी में सवार होकर
तो भाड़ा देते समय
जनभाषा में बतियाता है
और जब सुन्दरियों से बात करता है
तो खड़ी बोली की ऊँचाई से बोलता है
या धाराप्रवाह अँग्रेज़ी से उन्हें तोलता है

बचो
उससे बचो
उसके बिना ही
दुनिया अपनी रचो ।