भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

ओ ज़िन्दगी! / कविता भट्ट

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

निहार रही हूँ राह, देखूँ! तू आती है कि नहीं,
ओ ज़िन्दगी! यहाँ बैठ, मुस्काती है कि नहीं।

यह मेरे पुरखों का पुराना पठाली वाला घर है,
ताला लगा, दूब उगी, अब होने को खंडहर है।

कोदे की रोटी-झंगोरे की खीर तेरे संग खानी है,
मरती हुई माँ को दी अपनी ज़ुबान निभानी है।

आ ना! संग में गुड़ की मीठी पहाड़ी चाय पिएँगे,
पीतल के गिलास से चुस्कियाँ लेकर साथ जिएँगे।

कोने पड़ा- दादाजी का हुक्का साथ गुड़गुड़ाएँगे,
आ ज़िन्दगी! साथ में पहाड़ी मांगुल गुनगुनाएँगे।

शब्दार्थ: पठाली- स्लेटनुमा पत्थर जो पहाड़ी घरों की छत पर लगती है, कोदे(कोदा)और झंगोरे (झंगोरा)- उत्तराखंड के पारम्परिक पहाड़ी अनाज, मांगुल- विवाह आदि समारोहों में गाए जाने वाले उत्तराखंड के पारम्परिक पहाड़ी लोकगीत