ओ मेरी मदमय महुआ / ऋषभ देव शर्मा

एक फूल इन ओठों ने जब, पहली-पहली बार छूया
मुझे “आग मीठी होती है”, कुछ ऐसा एहसास हुआ

अब अंगारों पर चलने दो, बिजली मुझे चूमने दो
सूरज को बाँहों में भर लूँ, यारो, इतनी करो दुआ

सिर्फ तपन का दीवाना मियां, केवल जलने की इच्छा
आग-आग की रटन लगाए, वैरागी नादान सुआ

आँच सरीखी तू जलती है, मैं कुन्दन जैसा गलता
या तेरा-मेरा नाता है, ओ मेरी मदमय महुआ।

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