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ककहरा / पुरुषोत्तम प्रतीक

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‘क‘ से काम कर,
‘ख‘ से खा मत,
‘ग‘ से गीत सुना,
‘घ‘ से घर की बात न करना, ङ ख़ाली ।
सोचो हम तक कैसे पहुँचे ख़ुशहाली !

‘च‘ को सौंप चटाई,
‘छ‘ ने छल छाया,
‘ज‘ जंगल ने, ‘झ‘ का झण्डा फहराया,
झगड़े ने ञ बीचोबीच दबा डाली,
सोचो हम तक कैसे पहुँचे ख़ुशहाली !

‘ट‘ टूटे, ‘ठ‘ ठिठके,
यूँ ‘ड‘ डरा गया,
‘ढ‘ की ढपली हम,
जो आया, बजा गया ।
आगे कभी न आई ‘ण‘ पीछे वाली,
सोचो हम तक कैसे पहुँचे ख़ुशहाली !