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कट गया हूँ / शिवनारायण जौहरी 'विमल'

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मैंने सुन लिया था माँ
जब किया स्वीकार तुमने
अपने देवत़ा पति से
कि मेरा पित़ा तेरा पति नहीं था।

तुमने रों रो कर बताया था
कि उस दिन आसमाँ से
बरसती जारही थी शाम
बादलों से झर रहीं थीं फुहारें
गाए जा रहा था वह
प्यार में भींगे हुए नगमे
कमजोर होती जारही थी मैं
उसी कमजोर पल में
आगया मैं तुम्हारी कोख में।

माँ तुम्हारे हरेक अछर ने
कर दिए हैं सेकड़ों टुकड़े
मेरे मन प्राण श्रद्धा प्यार के
सभी से कट गया हूँ मैं।

तुम्हारे बेरहम सच ने
तोड़ दी कमर उस विश्वास की
जिसके लिए बेटा
शंकाकुल हो ही नहीं सकता।

कट गई पतंग का
कोई ठिकाना नहीं होता
पेड़ों में उलझ कर हवा के
झकोले सह नहीं पाती।

तुम्हारी एक सुन्दर छवि
अंकित होगई थी ह्रदय पर मेरे
जिसकी रोज़ पूजा किया करता था
उस पर स्याही तुमने ही छिडक दी।
और जो आज तक मेरे पित़ा थे
कितना प्यार था उनसे
कट गया हूँ आज उनसे भी।
कौन से रिश्ते से कहूँ
यह बाप हैं मेरे।

पावन प्यार की
दरकार थी तुमसे
बाकी सफर को पैर थे मेरे
सम्मान की ज़िन्दगी
के पैर तुमने काट डाले
पहाडी चढूँगा कैसे

पेड़ से टूटा हुआ पत्ता
वापस चिपकाया नहीं जाता
मोहोब्बत का दूसरा नाम
समझौता नहीं होता