भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
  काव्य मोती
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

कतना जुगो सें रोज अधरोॅ के अमृत / अनिल शंकर झा

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

कतना जुगो सें रोज अधरोॅ के अमृत
पीर्ल्हो पर प्यास आरो बढ़लै निरंतर।
कल्पवृक्ष ठीयाँ ठौर राखर्ल्हो पेॅ भुखले छी
भोगोॅ के ई भावना छै कैहनोॅ चिरंतर।
रोज ताजा फूल रूप रंग गंध लेनेॅ आबै
रोज रोज लुटल्हौ पेॅ लालसा प्रखरतर।
कोन धूप छाँव के ई खेल खेलै सकुनी ना
केकरा कारण काँपै द्रोपदी केॅ अंतर॥