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कथावशेषन / विजय चोरमारे / टीकम शेखावत

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विविधता से सजा हुआ यह देश
विविधता की विविध परम्पराएँ
निराली है भाषा तथा संस्कृति हर प्रान्त की
वहाँ के शहरों की

किसी भी प्रान्त को, शहर को या लोगों को
लगा नहीं वह पराया कभी
और उसे भी कोई शहर, वहाँ के लोग
भूख हड़ताल करते गाँववालों के संघर्ष की खातिर
दे देता है जो है सम्भव वह सब कुछ,
ख़ुद के और मित्रों की जेब से
शरीर के ऊपर जो कुछ था सब कुछ
 
मित्र के साथ लेकर शव का पिटारा
करता है फ़ासले तय पड़ाव दर पड़ाव
ट्रक से, टेम्पो से
भटक गए बच्चे को घर पहुँचाने
अपने पैसे से खँगालता है शहर को
दिखाता है चोर को सन्मार्ग की राह
कँजूस भी लुटाए दौलत उसके लिए
आदमी को जोड़ता हैं आदमी से
हर एक से लगाकर जान

मैं ढूँढ़ता हूँ उसमे अपने आप को
शुरुआत से ही
परदे पर करते हुए तुलना
स्वयं के ही भीतर झाँककर खोजता हूँ स्वयं को
हम कैसे हैं ये किसे पता?

किन्तु उस जैसा बनना चाहिए
सम्वेदनशील इनसान के सारे दुर्गुण है उसमें समाए
टूटा है भीतर से फिर भी न जाने कैसे जाता है
आगे ही आगे
एक झटके से समाप्त कर देता है जीवन-यात्रा

अब एक अनजाना डर मुझे सताने लगा है।

मूल मराठी से अनुवाद — टीकम शेखावत