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कभी कभी अक़्ल मुझपर कब्ज़ा कर लेती है / ईमान मर्सल

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रोशनी कितनी आत्ममुग्ध है
छत पर, कोनों में, टेबल पर फैली हुई.
प्रसन्नताओं ने सबको नींद के मुहाने पर खड़ा कर दिया है.
निस्संदेह यह मेरी आवाज़ नहीं है
कोई और गा रहा है
उस काले परदे के नीचे से जिस पर मैं सहारे के लिए झुकी हूं

नीचे देखूंगी तो पाऊंगी
कई कीड़े हैं जो दरवाज़े की ओर भाग रहे
और मेरी निर्वस्त्र देह पर चढ़ रहे
मैं कैसी दिख रही, इस पर बिल्कुल ध्यान न दूंगी
ताकि कोई और भी ध्यान न दे इस पर

पुरुष देश के भविष्य की चर्चा कर रहे
उनकी पत्नियां घर की मालकिन की मदद कर रहीं
बिल्लियां ताक रहीं जूठन का जश्न
और छत पर टंगी मकडिय़ां भी
कोई झमेला नहीं कर रहीं

जान पड़ता है इस परिवार के बच्चों को मैं पसंद आई
का$गज़ की एक कश्ती उन्हें देने के बाद
मैं यह नहीं समझा पाई
कि पानी से भरा तांबे का यह टब
कोई समंदर नहीं

'तभी गहरा सन्नाटा पसर जाता है'
अरब के ये बद्दू बंजारे बहुत पहले से जानते हैं यह बात
कि शब्द उड़ सकते हैं
और उन्हें दबाया नहीं जा सकता किसी वज़न से

और जाने क्या बात है कि
नए ख़ामोश श्रोताओं के आगे
अपनी पुरानी क्रांतियों की सफ़ाई देने के अलावा
मैंने क्रांतिकारियों को कुछ और बोलते नहीं सुना

पैग़ंबर अपनी विवशताओं से चुप हो जाते हैं
जैसे-जैसे वे उसके और क़रीब पहुंचते हैं
जिसने उन्हें भेजा है

दिक़्क़त यह नहीं कि उनका मुंह कैसे बंद किया जाए
बल्कि यह है कि जब कहने को कुछ नहीं होगा
वे अपने हाथ रखेंगे कहां

एक दिन अक़्ल मुझ पर क़ब्ज़ा कर लेगी
और मैं दावतों में जाना बंद कर दूंगी
अपनी आज़ादी का हल्ला बोल शुरू करूंगी तब
मैं तुम्हारे कानों की क़र्ज़दार नहीं रही अब

अंग्रेजी से अनुवाद : गीत चतुर्वेदी