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करसाण / हरिचरण अहरवाल ‘निर्दोष’

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मन मार’र रहग्यो
उनाळु फसल आबा क पाछ बी
करतो बी कांई
न्हं चुक पाया ब्याज-बट्टा बी कोई का
लेणी होर पड़्या छा, हाथ उधार
बेटी को ब्याव तो टाळणी पड़्यो छो
परण’र बी
अर कांई हो पावगो अऽऽस बी
छोरा की तो म’ल ही न्हं री सगाई
उग्या-आश्यां बऽऽस खटक छै
एक ही सांसो,
कस्यां चालगी घर-गृहस्थी
मूंडो फाड़ती महंगाई
बैठी छै त्यार नंगळबा कारण
सरकार को कांई
फेर बधा देगी
खाद-बीज, तेल-फूल
अर मरच-मसालां को भाव
लसण तो परणी ही पड़ी छी फेंकणी
कांई करंगा अऽऽस बी लगा’र
पण गार भेळ, गार होयां बना बी
न्हं भरै करसाण को पेट।