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करूँ मैं कहाँ तक मुदारात रोज़ / रंगीन

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करूँ मैं कहाँ तक मुदारात रोज़
तुम्हें चाहिए है वही बात रोज़

मुझे घर के लोगों का डर है कमाल
करूँ किस तरह से मुलाक़ात रोज़

मिरा तेरा चर्चा है सब शहर में
भला आऊँ क्यूँकर मैं हर रात रोज़

कहाँ तक सुनूँ कान तो उड़ गए
तिरी सुनते सुनते हिकायात रोज़

गए हैं मिरे घर में सब तुझ को ताड़
किया कर न रंगीं इशारात रोज़