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कर्ण-दशमा सर्ग / रामधारी सिंह ‘काव्यतीर्थ’

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दोहा-
सेनापति द्रोणाचार्य, स्वर्ग लोक सिधार
कौरव के दलों में तेॅ, मचलै हाहाकार।

कुंडलिया-
सब्भे जब शांत होलै, करलकै तब विचार
युद्ध संचालन केरोॅ, कर्ण पीठ पर भार।
कर्ण पीठ पर भार, सेना के साहस बढ़ाय
संधि के प्रस्ताव केॅ, दुर्योधन ठुकराय।
कर्ण के सहमति सें, ‘राम’ करि केॅ मोंन युद्ध
पूर्ण तैयारी सें, मचलै घमासान युद्ध।

तांका-
1. द्रोण मरण
सेनापति चयन
चयित कर्ण।
शल्य बने सारथी
कर्ण छै महारथी।

2. युद्ध आरंभ
भषण आक्रमण
अर्जुन-कर्ण
वीर भीमों तैयार
कर्ण भेलै लाचार।

दुःशासन क्रोधित होलै
बाणों केॅ बरसावेॅ लागलै,
भीम भी अति क्रुद्ध होलै
गरजी-गरजी बोलेॅ लागलै।

तोरा आज सफाया करवौ
आपनों शपथ केॅ पूरा करवौ,
एकधक्का भीमंे देलकै
दुःशासन के अंग तोड़ी मरोड़ी देलकै।

भीम के भयानक रूप देखी केॅ
बदली गेलै दिल लोगोॅ के,
काँपी गेलै तेॅ कर्ण शरीर
शल्य दिलासा, तों छोॅ वीर।

शल्य के बात सुनी केॅ कर्ण गोसैलै
असीम क्रोध साथें अर्जुन पर टूटलै,
दुन्हौं बीच घोर संग्राम छिड़लै
एक दोहरा बीच घोर आक्रमण होलै।

अर्जुन पर बाण चललै
उगलै छेलै जहर आग
तीर देखी केॅ कृष्णें,
अंगूठा सें दबाय देलकै रथ के भाग।

रथ पाँच अंगुल नीचे धसलै
ये युक्ति सें अर्जुन मरतें-मरतें बचलै,
सर्प मुखास्त्रों अर्जुन-मुकुट लेॅ भागलै
अर्जुन के क्रोध के ठिकानोॅ नै रहलै।

जोश-खरोश सेॅ कर्ण पर
बाण बरसावेॅ लागलै,
संयोग खराब, कर्ण रथ के पहिया
धरती में धंसी गेलै।

कर्ण घबड़ाय केॅ अर्जुन सें बोललै
ठहर जा अर्जुन, रथ-पहिया कीचड़ मंे फँसलै,
वोकरा उठाय केॅ जमीन पर रखना छै
तब तांय तोरा रुकी जाना छै।

हम्में जमीन पर, तोंय रथारूढ़,
बाण चलाना अच्छा नै छै,
नियम विरुद्ध काम नै करोॅ,
बाण बरसा बन्द रखना छै।

नियम विरुद्ध बात सुनी केॅ
कृष्ण बोली उठलै,
अखनी तोरा धर्म सुझै छौं,
चीरहरण समय कहाँ छेलै।

दुधमुहां बच्चा अभिमन्यु मारै में
तोरोॅ धर्म कहाँ छेलै,
मुसीबत पड़ला पर
आय तोरा धर्म याद ऐलै।

झिड़की सुनी केॅ कर्ण तेॅ
निरुत्तर होय गेलै,
सिर झुकाय, अटके रथोॅ सें
युद्ध जारी राखलकै।

यही बीचोॅ में कर्ण बाण
अर्जुन केॅ लागलै,
बाण प्रहार सें अर्जुन
थोड़ेॅ विचलित होलै।

मौका पाय कर्ण रथ पर सें उतरी गेलै
रथ पहिया उठाय के कोशिश करै छेलै।

मतर देवैं कर्णो के साथ छोड़ी चुकलोॅ रहै
हजार प्रयासोॅ के बाद भी पहिया नै निकललै।

कर्णे परशुराम के सिखैलोॅ मंत्रा याद करेॅ लागलै
मतर गुरु शापवश, वोहोॅ याद नहिये होलै।

मौका नै छोड़ोॅ अर्जुन, कृष्णें कहलकै
हुनको बात मानी केॅ बाण छोड़लकै,
कर्ण के सिर कटी केॅ धरती पर गिरलै
धर्म-अधर्म के फल कृष्ण सिर पर पड़लै।

दोहा
वचन मित्राता निभाय में, कर्ण गेलै सुरधाम।
धर्म-अधर्म न युद्ध में, सुआरथ, सिद्धि काम।

दंत कथा

दोहा
अंतिम सांस गिनै घड़ी, कृष्णें पूछै चाह
कृष्ण के बात सुनी केॅ, अर्जुन मन में थाह।

पार्थिव तन वहाँ जलेॅ, जहाँ कोय न जलपाय
सौंसे विश्व के चक्कर, कोय ठाम नै पाय।

अंततोगत्वा गिरधर, होलै बड़ी निराश।
आपनों हथेली रखी, कर्ण जलाय जस घास।

तांका छन्द
1. आरो कथा छै
देशोॅ में विख्यात
दानी कर्ण के
सवा मन सोना ही
बांटै बीच दीनों के।

2. कर्ण चौरा पेॅ
नितदिन बैठी केॅ
दै छेलै सोना।
आवेॅ कर्ण चौरा तेॅ
उदासीन बनलोॅ।

दोहा
सुनोॅ कथा कर्ण केरोॅ, कैसें सोना पाय।
राजा दक्ष के यज्ञ में, शिव के भाग न आय।।

सुर केॅ नौता मिलै, शिवजी छुटलै भाय।
देवसिनी वाहन सेॅ, हरषित हो-ही जाय।।


वाहन विमान सुनी-सुनी, सुती देखै अवकाश।
सुर विमान देखौ सती, पूछै जाय शिव पास।।

सर्वज्ञ शिवें कहलकै, यज्ञ करै छौं बाप।
त्रिदेव नौता सेॅ छुटल, तोरोॅ छुटलोॅ जाप।।

मनें-मनें सती सोेचै, पति आज्ञा मिल, भाग।
कुच्छू दिन पिताघरोॅ में, भूलौं पति परित्याग।

भय, संकोच, प्रेमसनी, बोलै मन हर बात।
आज्ञा हो पति देव के, देखौं पित अरू मात।।

बात छौं तेॅ बहुत भूलोॅ, हमरहौ छौ पसंद।
नौता नै भेजलकहौं, नै होत्हौं आनंद।।

बिन बुलैनें जों जैभेॅ, नै होत तोर मान।
गुरु, पिता, दोस्त घरोॅ में, बिन बुलाय प्रस्थान।।

राजा दक्ष नाखुश छौं, झलकै नै कल्याण।
बहुत समझैलकै शिवें, सती नै बुझै हान।।

बाल हठ, तिरिया हठ केॅ, जान सकल जहान।
आज्ञा देलकेॅ शिव जी, गण साथें प्रस्थान।।

मायके पहुँचलै सती, नै अइलै कोय पास।
दक्षोॅ डरोॅ सें सब चुप, माता आय हुलास।।

सती केॅ तेॅ देखी के, दक्ष के जलै शरीर।
घुमी-घुमी सती जी, यज्ञ देखी अधीर।।

सब देवोॅ के भाग छै, नै छै शिव के भाग।
आबेॅ समझ में ऐलै, हमरोॅ ई छै अभाग।।

पति के अपमान देखी, सती हिय लगै आग।
दुःखी होय बोलै सती, फुटलोॅ हमरो भाग।।

आग बबूला देख केॅ, माताजी समझाय।
शिव अपमान असहय छै, हृदयबोधन समाय।।

क्रोध सें बोललै वचन, शिव निंदक फल पाय।
सोंसे जगत के आत्मा, जगत पिता कहलाय।।

मंद बुद्धि निंदक, शिव केॅ समझ न पाय।
तन हुनका सेॅ उत्पन्न, अब यह जल न जाय।।

शिवोॅ केॅ हिय में धारी, ई तन करवै त्याग।
यहेॅ कही केॅ सतीजी, योगाग्नी में तन लाग।।

तांका छन्द
1. यज्ञशाला में
मचलै हाहाकार
सती मरन।
सुनै शिव के गण
यज्ञ विघ्वंस करण।

2. मुनि भृगुजी
देख यज्ञ विध्वंस
ध्वंस बचाय।
शिव केॅ ज्ञात होलै
तत्काल आवी गेलै।

3. माता सती के
अधजललो तन
शिव के कान्हा।
लोक-लोक भ्रमण
चक्र सुदरसन।

4. बामन टूक
वाम नयन भाग
मुंगेर पाय।
पावन गंगा तट
चंडिका शक्तिपीठ।

5. नयन पीड़ा
चंडिका दै काजल
दूर हो पीड़ा।
असथान विख्यात
रोगी आवै प्रभात।

कुंडलिया
कर्णचौरा मुंगेर में, चंडिका थान पास
दानी कर्ण रोज-रोज, पूजा करै हुलास।
पूजा करै हुलास, सोना दै चंडी माय
सवा मन सोना रोज, कर्ण चंडिका सें पाय।
कहै ‘राम’ कविराय, दान करै भुलाय वर्ण
दीन दुखी गुनगान, जय हो महादानी कर्ण।