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कलही कुचालीन करकसा ओ फूहरी के / महेन्द्र मिश्र

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कलही कुचालीन करकसा ओ फूहरी के
देखे कोई जतरा पर बहुरे ना प्राण के।
भोरे मुंह देखेऊ तो भूखे मरे रात-दिन
अटर-पटर बोले ठीक राखे ना जुबान के।
कथा ओ पुराण के त लगे नाहीं जाले कबों
फोरेले भतार के कपार कूद फान के।
साधू संत माने ना दान ना छेदाम करे
महेन्द्र बचावे अइसन कलही कुनार के।