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कली चम्पा की / कविता भट्ट

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ओ चम्पा की कली!
सच को झूठ के आवरण में लपेटकर
संसारी छलते रहे तेरा मन अपनत्व समेटकर
मुस्कुराती हुई सकुचाई-सी ओ चम्पा की कली!

तू कितने संघर्षों के परिणामतः
इस रंग-रूप में ढली
तूने अपने रूप-सुगंध की खातिर
सहा कितनी बरखा बौछार को

कभी तीर सी बूँदों ने
कभी धूप की तीखी गरमाहट ने
कभी शाम के अंधियारों ने
कभी मौसम की सर्द रातों की कडु़वाहट ने

किस तरह तुझे सताया-रुलाया
फिर चली पवन यह मदमाती
यौवन को बरसाती
एक सवेरे आया तेरे जीवन में

एक रंगीन हवा का झौंका
सूरज की किरणों में
खिल उठा यौवन तेरा मंद मुस्कान लिए ओ कली!
कितने कटु-संघर्षों से निखरा रंग रूप तेरा

हँसते कुछ समय भी न बीता था
किंतु अंधे मानव ने न देखी तेरी पीड़ा
न देखी तेरी स्वप्न कल्पना न जीवन

तोड़ ले गया मानव एक
स्वार्थ रूपी राक्षस की खातिर
निज स्वार्थ को पूजन का नाम देकर
तेरे यौवन में, तेरे जीवन को मिटाकर

फिर माँग रहा ईश-वन्दन में
धन-वैभव-नाशवान् जीवन की अमरता
और तुझे बिछोह सहना पड़ा उस डाली का
जिसने तुझे सहलाया खिलाया उस माली का
अब तू प्रसन्नता देने योग्य हुई तो हो गई
जिसने तुझे सँवारा उसी के लिए अनछुई

किसी ने तुझे सहलाया और किसी ने रुला दिया
ओ चम्पा की कली
लघु तेरा जीवन
अचिर होकर भी तेरा चिर यौवन
स्वार्थी मानव ने नोंच डाला उसे भी।