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कविताएँ (5) / धर्मेन्द्र चतुर्वेदी

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वह नहीं जानता
वे दोनों (कवि और कविता )एक दूसरे से कैसे मिले थे ,
पर जानता है जरूर,
समय के साथ उनके रिश्ते हुए हैं
प्रगाढ़ से प्रगाढ़तर |

जब-जब कविता हटाती है
उसके चहुँ ओर व्याप्त धुंध ,
और अंधियारे अंतस को बना देती है
स्फुरित एवं गुंजरित ,
तब कविता उसे लगती है
माँ जैसी पूजनीय
और आराध्य की तरह अनुकरणीय ;

फिर जब उसे
फूल में , पात में / ऋतुओं की बाट में
टीन में , कनस्तर में / मिटटी में , पत्थर में
चाँद में सूरज में / या पश्चिम में , पूरब में
यहाँ तक कि
शून्य में भी दिखती हैं कविताएँ ,
तब कविता बन जाती है उसकी प्रेमिका ,
जिससे निर्लिप्त होकर वह किया करता है प्रेम |

और फिर जब वह भावना को समेटकर
एक कविता को देता है जन्म ,
और पालता है उसे बड़े नाज़ से ,
तब कविता में उसे दिखती है बेटी
जिसे बड़े होता देख उसे हुआ करता है हर्ष |

यही क्रम चलता है अनवरत ,
और बिना जाने कविता के साथ रिश्ते ,
तिलिस्म में बँधकर कविता के
वह लिखता रहता है ;
एक के बाद एक
अनेकानेक कविताएँ |