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कविता: पांच (मेरी मां के जमाने में...) / अनिता भारती

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मेरी मां के जमाने में
औरतों की होती थी नन्हीं दुनिया
जहां वे रोज अचार पापड़
बनाते हुए झांक लेती थीं
आह भर आसमां का छोटा-सा टुकड़ा
नहीं कल्पना करती थी उड़ने की
खुश थीं वे सोने-चांदी के बिछुए पहन
उन्हें भाता था आंगन में लगा तुलसी का पौधा
बर्तनों को बड़े लाड़-प्यार से पोंछकर रखती थीं
गोया कि वे उनके अपने बच्चे हों
आंगन की देहरी तक था उनका दायरा
मेरे पिता चाचा ताऊ पड़ोसी की निगाह में वे अच्छी पत्नियां थीं
एक दिन उन्होंने बोझ से दबी अपनी कमर सीधी कर ली
कि अचानक उसके स्वर में भर गई गुर्राहट...
”क्यों? आखिर मैं ही क्यों?
आखिर कब तक चलेगी
गाड़ी एक पहिए पर?“

उस दिन मेरी मां के अन्दर
मेरे जमाने की औरत ने जन्म लिया
मेरे जमाने की औरतें
कसमसाती हैं झगड़ती है चिल्लातीं हैं
पर बेड़ियां नहीं तोड़ पातीं
कमा-कमा कर दोहरी हुई जाती हैं
उधार के पंख लगा कर इधर से उधर
घर से दफ्तर दफ्तर से घर
फिर लौट समेट लेती हैं अपने डैने
पर मेरी बेटी जो हम सबके भविष्य की
सुनहरी नींव है
जो जन्म-घुट्टी में सीख रही है
क्यों? कैसे? किसका?
पता है मुझे वह बदल देगी हालात्
उसमें जज्बा है लड़ने का बराबरी का
उसे पता है संगठन एकता का रहस्य...!