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कवित्त / अछूतानन्दजी 'हरिहर'

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स्वामी दयानन्द ने यों खेद ले विचार किया,
वेद अधिकार यदि शूद्रन ना बतायेंगे।
तब तो न शूद्र जाति द्विजन की सेवक रहात,
इनको तो ईसाई या मुसलमां अपनायेंगे।
यदि अधिकार देत तो बपौती बेर लेत,
क्योंकि रिग्वेद में संग्राम पढ़ पायेंगे।
याते हैं उपाय एक रहे न इतिहास नेक,
अर्थ माँहिं आदि हिन्दू बंश को मिटायेंगे।

अछूत यानी पवित्र बंश का, रहने देय न गौरव मान,
यों सब संस्कृति छलवादि, मिटा रहे निज बंश महान।

आर्य वंश तादाद बढ़ायें, आदि निवासी देंय घटाए,
अपनी जथा प्रबल कर लेवें, औरन देवें निबल बनाय।

इसी नीति पर वर्ण व्यवस्था, रच के धर्म चलाई चाल,
रखें गुलामी में फुसला कर, धर्म आड़ में करें हलाल।

जो कोई होनहार निज बल से, पढ़ लिख लेंय वेद इतिहास,
उसे खेंच लें द्विज श्रेणी में, करने पाय न बंश विकास।

जो कहीं रह के जोश प्रचारे, तो देवेगा बंश जगाय,
जो जग जावें असली हिन्दू, नकलिन की दुर्गति हो जाय।

कौन गुलामी करे हमारी, हमको फेर कहाँ आराम,
सुख सपने हूँ में नहिं मिलिहें, करिहें कौन-कौन हम काम।

हम से मेहनत नहिं होने की, परे-परे हम पाप कमायँ
ब्याज त्याज घर फँसा गरीबन, कलम कसाई बन धन खाँय।

जिन के श्रम से भए धनिक हम, कैसे करें इन्हें आजाद,
रूखे रोट महनती खा के, हमें देयं छत्तीसों स्वाद।

यही सबब व्यौपार द्विजों ने, अपने रखा गोल के हाथ,
जिससे धन बल बढ़े न विद्या, ऊपर उठें न होंय सनाथ।

जो आजाद होन तुम चाहो, तो अब छाँट देउ सब ‘छूत’,
आदिबंश मिल जोर लगाओ, पन्द्रह कोटि सछूत ‘अछूत’।