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कहाँ जाऊँ किधर जाऊँ / प्रदीप शुक्ल

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कहाँ जाऊँ
किधर जाऊँ
दुखी मन सोचता है

कहा राजा ने
अब इस
राज की परजा सुखी है
विकासी रेख देखो
देश की उर्ध्वामुखी है
अभी बैठे
रहो तुम
बस घरों में, देखते जाओ
करो तुम बंद आँखें
स्वप्न में ही मुस्कुराओ
मगर ये
भूख से बच्चा
तो छाती नोचता है

किसी को
लग रहा है
छा रहे बादल घनेरे
न जाने कौन सी
नाकामियों की ग्रंथि घेरे
कहीं
कुछ भी उसे
अच्छा नहीं दिखता यहाँ पर
उसे ये देश जाने
लग रहा क्यों यातनाघर
जहाँ दिखती
प्रगति रेखा
उसे बस पोंछता है
कहाँ जाऊँ
किधर जाऊँ
दुखी मन सोचता है।