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कहाँ है ओ अनंत के वासी / गुलाब खंडेलवाल

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कहाँ है, ओ अनंत के वासी ?
तू मन मे है फिर भी आँखे हैं दर्शन की प्यासी

प्रेम-भक्ति के तार भले ही मैंने तुझ से बाँधे
रह-रहकर उठ रहे विवादी सुर भी उनसे आधे
नयनों के सम्मुख दिखती है मुझको अंध गुफा-सी

कितनी बार परस तेरा मैंने मस्तक पर पाया
कितनी बार डूबते मुझको तू तट पर ले आया
फिर भी क्यों हटती न हटाये चिंता की गलफाँसी ?

नियम नियामक दोनों तू नियमों का हो दृढ पालक
पर न नियम क्या बने क्षमा के, भूल करे यदि बालक
गिरते-पड़ते भी जो तुझ तक आने का अभिलाषी ?

कहाँ है, ओ अनंत के वासी ?
तू मन मे है फिर भी आँखे हैं दर्शन की प्यासी