भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
  काव्य मोती
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

कहाँ हो मुक्तिदाता / असंग घोष

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

नाचता रहा दिन-ब-दिन
अपनों की ही उँगलियों पर
उनके इशारों के अनुरूप / तृप्त करता रहा
उनकी लालसाएँ
हरदम मारकर अपनी इच्छाएँ
जन्म से ही मज़बूत अदृश्य धागों में बँधा
मैं आज तक बँधुआ हूँ,
और तुम!
कहाँ चले गये हो
मुक्तिदाता?