भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

कहु का ना छुटी बा भजे के हरि नमवा / दरसन दास

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

कहु का ना छुटी बा भजे के हरि नमवा।।
धधा तोरा धावल फिरे चढ़े गरदनवा
माया के बिसरेला भइल बा हैरनवा।।
साधु देखी पीठ देके भागेले चुहानवाँ
माया के मुँह देखी भइल बा मगनवा।।
छाती तोहर कड़खी जेह दिन आई बलवनवा
परचे-परचे लूट ली, मिली ना ठिकनवाँ।।
छाड़ रे माया मोह लागे ना बिगनवाँ
कहे दरसन पद भजन निरबनवाँ।।