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क़दम क़दम न मुझे पूछ एक ताज़ा सवाल / प्रेम कुमार नज़र

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क़दम क़दम न मुझे पूछ एक ताज़ा सवाल
उदास रात के सीने पे और बोझ न डाल

उसी के ज़िक्र से हम शहर में हुए बदनाम
वो एक शख़्स कि जिस से हमारी बोल न चाल

बिछड़ गया न वो आख़िर अधूरी बात लिए
मैं उस से कहता रहा रोज़ रोज़ बात न टाल

सितमगरी की नई रस्म ढूँढ ली उस ने
हमारे सामने देता है दूसरों की मिसाल

मिरे ख़याल में चाबुक पसंद था वो जिस्म
ये कैसी भूल हुई खींच ली न उस की खाल

कभी जो बैठ गए जा के दो घड़ी उस पास
‘नज़र’ जी धुल गया बरसों का जी से हुज़्न ओ मलाल