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काँटोंवाली बाड़ / आरती मिश्रा

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1.

ठहरो, वहीं रुको
पास मत आओ
कि असंख्य काँटे उगे हैं मेरी हथेलियों में
तुम भी लहूलुहान हो जाओगे
कब तक मरहम-पट्टी कर करके क़दम बढ़ाओगे
तुम तोहमतें लगाओ
उससे पहले आगाह किए जाती हूँ

2.

मैं जानती हूँ
पूछे बिना नहीं रहोगे
मेरे रहस्यों को खोजने
झाँकोगे इधर-उधर
मेरी हथेलियों में भरे काँटे बीनने की
कोशिश
ज़रूर करना चाहोगे

3.

जानबूझकर उगाए हैं मैंने
ये नुकीले काँटे, अपने चारों ओर
आख़िर जंगली जानवरों से बचाता ही है
किसान अपने खेत

4.

वैसे तो चुभते हैं मुझे भी
रिसता है लहू
ये नुकीले शुष्क काँटे
भेद करना नहीं जानते अपने पराए में
बस चुभ जाते हैं
गोरी-काली मोटी-मुलायम
कैसी भी त्वचा में
किसी भी मन में

5.

औरों से थोड़ा भिन्न हो तुम
झाड़-पोंछकर मेरे शब्दों की चुभन
यूँ लौट-लौटकर पूछते हो...
क्या काँटों के बीच फूल खिलने की
रूमानियत में
यक़ीन करते हो?