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काट डालूँगा उन पैरों को / असंगघोष

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मेरा नाम अनाम
कोई कुछ भी रख दे
अथवा न रखे
आखिर मुझे पुकारना ही है
कोई किसी भी नाम से पुकारे
क्या फर्क पड़ता है?

जब कोई
क्यों बे,
अबे कहकर पुकारे
या जात से पुकारे
तब भी
क्या फर्क पड़ता है

मैं भी औरों की तरह
पैदा हुआ नंगा
उपनयन से
मेरा दूसरा जन्म नहीं हुआ
न ही कोई संस्कार हुआ
द्विजों की तरह
कान में जनेऊ लपेट
मूतना
मेरे लिए मना जो था

ऐसी कई सारी पाबन्दियों को
झेलने के बावजूद
यदि कोई मुझे
अछूत कहकर पुकारे
तो फर्क पड़ता है

अछूत!
मेरा नाम नहीं है
कि कोई भी
अछूत!
कहने की हिमाकत करे?

अछूत एक घाव है-
तुम्हारा ही दिया हुआ
जो नासूर बनकर
तेरी ही सड़ी वर्ण व्यवस्था से
असहनीय पीड़ा देता हुआ
लगातार रिस रहा है

इस नासूर से
पूरी तरह पाना है निजात
भले ही
काटना पड़े
आदि-पुरुष के, ”वही पैर“
बिना किसी संकोच के
तो मैं
काट डालूँगा
उन पैरों को
चाहे तेरा भगवान हथियार धारण कर
तेरे मिथक को बचाने
इस धरा पर
नया अवतार ही क्यों न ले लेवे।