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काठमाण्डू / प्रमोद धिताल / सरिता तिवारी

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मानों कबाड़ख़ाना है यह शहर

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मानों
कबाड़ख़ाना है यह शहर

और सारी नगर की सुन्दरता का निर्विकल्प ठेका लेकर
रंगों के डिब्बों के साथ खड़ी हैं
कैटरीना कैफ़!

ये सफ़ेद–सफ़ेद सरकारी मकान
इतने बड़े–बड़े अड्डे
उत्पादन करते हैं
दुनिया में कहीं न बिकने वाले फ़ालतू विचार
और वही विचार के कूड़ा-करकट के ऊपर खड़ा है
शहर का वास्तुशास्त्र

इस शहर में
पैदा नहीं हुई
कोई नयी चीज़
कोई सुन्दर चीज़

श्री जंगबहादुर राणा[1] द्वारा जारी
मुलुकी ऐन[2]का दफ़ा रट–रट के तैयार हुआ
तोता है प्रशासक
मास्टर की गर्दन और सहपाठी का खप्पर कुचलकर
राजनीति का रोमांच सीखा हुआ
गुण्डों का सरदार है नेता
सत्ता का अवशिष्ट इन्तज़ार करके
हरदम द्वार के बाहर बैठा हुआ
श्री हीन है पत्रकार

दण्डवत मुद्रा में झुकते–झुकते
खड़ा होना ही भूल चुका
चम्चा है लेखक

इनमें से किसी के पास नहीं है
शहर के लिए
मौलिक सौन्दर्यबोध


आसमानी पुल की दिवारों मे
में
स्निकर्स चॉकलेट के विज्ञापन लटकाकर
कहाँ हो सकती है अनुभूति स्वादिष्ट?
जब इन्हीं विज्ञापनों को देखकर शुरू होने लगती है उल्टियाँ
बदलता है तब स्वाद का भी मनोविज्ञान

किसने बनाया इस शहर को
ऐसा बेरंग, सुगन्धहीन?
कोई तो बता दो
कहाँ छिपकर बैठा है
यह अभागा शहर का
निजी रंग और सुगन्ध?

एक से एक हेरिटेज
एक से एक हिडेन ट्रेजर
सब
केवल क्यूरियो[3] की दुकानों में
सजाकर रखे हुए
प्राणहीन मूर्ति जैसे लगते हैं
मानों
दूसरे किसी मुल्क का शहर
अपनी उतरन मुस्कान लेकर
कृपापूर्वक खड़ा है इस शहर में
और अपूर्व सौन्दर्य की दूत जैसी
रास्ते, चौरस्ते में
बस स्टॉप में
चौबीसों घण्टे जागे रहती है
कैटरीना कैफ़!

नज़दीक ही
इनामेंल उतरे हुए अक्षरों में लिखा हुआ है –
‘मेरो पौरख, मेरो गौरव, मेरो काठमाण्डू।’

  1. नेपाल के प्रथम राणा प्रधानमन्त्री जिन्होंने कुख्यात कोत पर्व (वि.सं 1903 तदनुसार सन् 1846) में शाही षड्यन्त्र की एक गोटी के रूप में नेपाल के दरबार में प्रवेश किया और चालाकीपूर्वक 104 वर्षीय राणा-शासन की नींव रखी। इन्होंने अपने आपको श्री 3 महाराज की पदवी दिलवाकर लगभग सभी राजकीय शक्ति हथिया ली थीं और तत्कालीन राजा को नाममात्र का बना दिया था। इनके बाद इनके भाई और उनके बेटे लगातार देश के प्रधानमन्त्री हुए। इस काल को नेपाल का अन्धकार युग कहा जाता है -अनुवादक
  2. नेपाल की प्रथम लिखित संहिता। यह मनुवादी आचार पद्धति और कट्टर वर्ण-व्यवस्था का हूबहू अनुसरण थी।
  3. किसी देश की पहचान दिखानेवाली मूर्ति, मुद्रा, कपड़ा या सांस्कृतिक महत्व की वस्तु-बिक्री करने की दूकान।