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काफ़िर / सीमा संगसार

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तुम करते रहे घुर्णन
अपनी परिधि में
मैं
देखती रही
अपलक
पृथ्वी का घूमना
मैं
चाहती थी
अक्ष होना
उस धूरी की
जिसमें
तुम्हारा संसर्ग हो
और / तुम मुझे समझाते रहे
तटस्थता के नियमों को...

सुनो काफिर,
इश्क़ कोई
उदासीनता वक्र विश्लेषण का सिद्धांत नहीं
जहाँ हम तटस्थ रहे...

आवेगो़ को
कभी बांध नहीं पाई मैं
अपने जूङे की
उपत्यकाओं म़े
और तुम्हें पसंद नहीं
मेरा यो़ खुलकर बह जाना...

मैं
दोनों वक्रों की
 वह संयोग हूँ
जहाँ तुम्हारी
उदासीनता भंग होती है...

वक्रों के इस
 कुटिल चाल में
मैं चाहती हूँ "संग" होना
और तुम "सार" किए जाते हो...