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काला सच / प्रवीन अग्रहरि

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जब मुर्दे के पीछे जनता 'राम सत्य है' कहती है
जब कच्ची सीली दीवारें कीचड़ बनकर ढहती हैं

जब बेवाएँ नंगी आँखें आँख मूँद कर सहती हैं
जब हड्डी पड़ी राख की पोथी गंगा जी में बहती हैं

जब एक गड़रिया नदी किनारे भेड़ चराते सोता है
जब झुकी कमर का इक कुम्हार मिट्टी का ढेला ढोता है

जब चटक घाम में इक किसान उम्मीद की फसलें बोता है
जब पिघला लोहा छू जाने से लोहार का बच्चा रोता है

जब सुनसान में रोने की आवाज़ सुनाई पड़ती है
जब सड़क किनारे मरे हुए कुत्ते की आँते सड़ती है

जब बोझ बने बूढ़ी माओं की जिन्दा लाशें गड़ती है
जब दस पिल्लों की खातिर कुतिया इक रोटी को लड़ती है

जब दूर खेत में इक लड़की की टांगें खोली जाती हैं
जब चीरघर में पड़ी लाश पर मक्खी गाना गाती है

जब बच्चों के खा चुकने पर वह बस पानी ही खाती है
जब बच्चे पैदा करने पर माँ बेहिसाब चिल्लाती है

जब दुर्घटना के बाद फटा सिर थोड़ी दूर घिसटता है
जब एक लाख के लालच में खून का धब्बा मिटता है

जब आठ आने की चोरी पर मजदूर का बच्चा पिटता है
जब बच्चों की कम्पट टॉफी में जहर मिला कर बिकता है

जब दुनिया के इस रंगमंच पर अलग कहानी होती है
जब धर्म न्याय और करुणा भी अपने वजूद को खोती है

तब भाग्य विधाता ऊपर बैठा यह दृश्य देखकर रोता है
उसके संतानो की दुनिया में ऐसा भी क्यों होता है

क्यों करती हैं पृथक विश्व को धर्म जाति की परिभाषा
एक रहें सब नेक रहें बस यह ईश्वर की अभिलाषा

ईश्वर विचलित हो जाता है सोच-सोच यह बात सदा
अपना क्रुद्ध रूप फिर वह दिखलाता है यदा कदा

यदि कहानी रुकी नहीं तो वह तांडव दिखलाएगा
राह-राह पर घाट-घाट पर बस मसान रह जाएगा।