भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

कालीबंगा: कुछ चित्र-13 / ओम पुरोहित ‘कागद’

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

सूरज
फिर तपा है
चमका है
धरा का कण-कण
कालीबंगा के थेहड़ में

नहीं ढूँढता छाँह
तपती धूप में
न कोई आता है
न कोई जाता है

है ही नहीं कोई
जो तानता
धूप में छाता

वो देखो
चला गया
पूरब से पश्चिम
थेहड़ को लांघता
सूरज।


राजस्थानी से अनुवाद : मदन गोपाल लढ़ा