भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

काव्यालोचना की गीतविरोधी अड़मस्ती पर / राम सेंगर

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

कविता को लेकर,जितना जो भी कहा गया
सत-असत नितर कर व्याख्याओं का आया ।
कविकर्म और आलोचक की रुचि-अभिरुचि का
व्यवहारगणित पर कोई समझ न पाया ।

'कविता क्या है' पर कहा शुक्ल जी ने जो-जो
उन कसौटियों पर खरा उतरने वाले ।
सब देख लिए पहचान लिए जनमानस ने
खोजी परम्परा के अवतार निराले ।

विस्फोट लयात्मक सम्वेदन का सुना नहीं
खण्डन-मण्डन में साठ साल हैं बीते ।
विकसित धारा को ख़ारिज़ कर इतिहास रचा
सब काग ले उड़े सुविधा श्रेय सुभीते ।

जनमानस में कितना स्वीकृत है गद्यकाव्य
विद्वतमँचों के शोभापुरुषो, बोलो ।
मानक निर्धारण की वह क्या है रीति-नीति
कविता की सारी जन्मपत्रियाँ खोलो ।

कम्बल लपेट कर साँस गीत की मत घोंटो
व्यभिचार कभी क्या धर्मनिष्ठ है होता ।
कहनी-अनकहनी छल का एक पुलिन्दा है
अपने प्रमाद में रहो लगाते गोता ।

बौद्धिक, त्रिकालदर्शी पण्डित होता होगा
काव्यानुभूति को कवि से अधिक न जाने ।
जो उसे समझने प्रतिमानों के जाल बुने
जाने-अनजाने काव्यकर्म पर छाने ।

गतिरोध बिछा कर मूल्यबोध सम्वेदन का
कोने में धर दी लय-परम्परा सारी ।
वह गीत न था, तुम मरे स्वयँभू नामवरो
छत्रप बनकर कविता का इच्छाधारी ।

इस छन्दमुक्ति में, गद्य बचा कविता खोई
सब खोज रहे हैं,अन्धे हों या कोढ़ी ।
काव्यानुभूति की बदली हुई बनावट की
नवगीति-पीठिका खेल-खेल में तोड़ी ।

गति लय स्वर शब्द साधना की देवी कविता
कविता से कवितातत्व तुम्हीं ने खींचे ।
कविता न कथ्य का गद्यात्मक प्रक्षेपण है
कविता, कविता है ,परिभाषाएँ पीछे ।

जड़ काटी है तुमने गीतों की सोच-समझ
यह विधा दूब थी, तो भी पनपी फैली ।
लय, कथ्य-शिल्प के प्रगतिमार्ग की रूढ़ि नहीं
है रूढ़ समीक्षा, विगलित और विषैली ।

कस कर कसौटियों पर एकाँगी मानदण्ड
सुविधावादी संस्कारहीनता वाले ।
पहचान परख कविता की गडमड कर डाली
लयवत्ता पर कुछ ऐसे डोरे डाले ।

हुक्का-पानी तक गीतकार का बन्द किया
पूरी बिरादरी ने है उसको छेका ।
मर नहीं गया वह, और नया होकर उभरा
जादूनगरी को कौतुक लगा मज़े का ।

जो पद्य नहीं कूड़ा हो ऐसी कविता में
कवितामयता की खोज, पिनक है भारी ।
इस मनोग्रन्थि को मूल्यदृष्टि में मढ़ करके
घर में ही भैये करन लगे घरदारी ।

मुखरित समाजसत्ता है गीतों में पूरी
बस करो, अर्थ की लय के इस टण्टे को ।
स्वर और शब्द की मूर्तरूप लयकारी में
परिवेश समूचा रचा-बसा है देखो

मत कलावृत्ति के मौलिक मूल्यों को खुरचो
इस उत्कटता में बात न कुछ बोलेगी ।
सन्धान नए मूल्यों का यदि सच्चा न हुआ
काव्यालोचन की दुनिया ही डोलेगी ।

आतँक नहीं, लय मुख्य धुरी है कविता की
यह धुरी कमाण्डो दस्ते क्या तोड़ेंगे ।
जीवन के और प्रकृति के लय से प्राण जुड़े
बेहया हवा के रुख को हम मोड़ेंगे ।

सम्वाद और अनुवाद बुद्धि के जादू से
भाषा के नए वितान भले ही तानें ।
जिस काव्यकर्म की शक्ति सपाटबयानी है
उस कविता को कैसे हम कविता मानें ।

संस्कृति का प्राण जिसे कहते थे लोग कभी
वह गीत अनादर मक्कारों का झेले ।
खारिज़ कर सारे रागमयी सम्वेदन को
क्यों हठी समीक्षक व्यर्थ आग से खेले ।

अन्धी-सँकीर्ण गली के सारे प्रगतिशील
अतिरेक असँगति पहले अपने जानें ।
प्रतिबद्ध जहाँ जिसके प्रति जितना वे होलें
जो भी हों लेकिन खुद को ख़ुदा न मानें ।

भाषा सम्वेदन कथ्यरूप की अन्तर्लय
बान्धी-साधी तो नहीं गई पर तोड़ी ।
कड़ियाँ-लड़ियाँ आत्माभिव्यक्ति की उलझ गईं
उलझाव प्रयोग बना फिर होड़ा-होड़ी ।

अपनी तरँग में ग़ाफ़िल उतरे रचना में
बिन जुड़े जगत से जीवन का सच पाया ।
कोरे विचार को अनुभव का दर्ज़ा बख़्शा
सम्वेदन में कोई उद्वेग न आया ।

सच्चाई भावचेतना की समझी न गई
कवितामयता की गहराई सब जानी ।
खोटे एकाँगी उपादान ले पसर गया
सर्वज्ञ हुए का ढोंग निरा बेमानी ।

अपने अपनों का यशोगान बहु-लीलामय
बदकार पक्षकारी का रँग जमाकर ।
क्या यही धर्म है जिसे समीक्षा धारे है
विश्लेषण के हर पहलू पर छा-छाकर ।

कविता की प्रयोगशालाओं के परखयन्त्र
बेकार हुए तो फेंको, नए मँगाओ ।
यह गद्य-पद्य की रार बहस का मुद्दा है
सारे विवाद को खुले मँच पर लाओ ।

लोकापवाद के स्वर सारे विश्लेषित हों
स्वीकारों की गौरवगाथा को लेके
ओछी छिछली काइयाँ परीक्षाविधियों की
नैतिकता सच्चा आलोचक ही देखे ।

मानव-आस्था की उदात्तता की बात छोड़
वह सबसे पहले अपने को पहचाने ।
गतिमान प्राण-तत्वों की अन्तर्धारा को
अनदेखा नहीं करे, उसको भी जाने ।

कानी कौड़ी है मोल कपट मूल्याँकन का
हम दाँत गड़ा कर जकड़ करेंगे ढीली ।
आसन्न मौत से डरने की कुछ बात नहीं
अनुभूति हो गई अपनी बहुत नुकीली ।

संस्कृति सौन्दर्य प्रकृति औ' जीवन के जिसमे
पड़ते हैं साफ़ सुनाई सारे स्पन्दन ।
गीतों की ऐसी परम्परा क्यों अपमानित
क्यों ठेठ गद्य का कविता में अभिनन्दन ।

मैदान मारकर भावाकुल चौकस प्रबुद्ध
इतिहासपुरुष बन गए, कहा जाता है ।
कविता की परम्परा को मटियामेट किया
जो काता सो ऐसा महीन काता है ।

कोलाज़ अराजक बतखोरी का उभर रहा
इन सभा-गोष्ठियों की ऐसी की तैसी ।
विश्वास समूची कविता के तोड़े इनने
सत्यान्वेषी कुण्ठा की रच फ़ेण्टेसी ।

'सम्वाद विवाद वाद' के राजा भैयों ने
क्या नहीं किया अपकीर्ति नई फैलाने ।
हम पगडण्डी की खूँद-पीट में लगे रहे
जीवन संस्कारों को ठीहे तक लाने ।

रॉपी सुतारियाँ पैनी करीं पन्हाँ गाँठे
इस अनुभव को प्रमाणिक भले न मानो ।
अस्मिता हमारी, एक हाथ की ताली है
कैसे बजती है, हम जानें, तुम जानो ।

माटी परम्परा की हमने गूँधी-खूँदी
तब भावसत्य में यह नवीनता आई ।
इस जिए-पचाए जीवन से जो समझ मिली
है यही विरासत अपनी मेरे भाई ।

श्रीमानों ने अपवित्र ह्रदय की व्याख्या कर
मुक्तावस्था के गुर सारे सिखलाए ।
रसदशा पत्थरों ने समझी या वे जाने
हम गीतकार सब हृदयहीन कहलाए ।

आधारशक्ति ले टूटी हुई पीठिका की
हम खड़ा कर रहे पुख्ता पुल गीतों का ।
विश्वास जगे या मरे हमें परवाह नहीं
कविता से भागे असहज भयभीतों का ।

निष्प्राण निरर्थक भ्रामक भावविलासमयी
कल्पनाजाल रूमानी हमने तोड़े ।
जीवनयथार्थ से आँख मूँद कर मौज़ न ली
खाए गीतों ने खुली पीठ पर कोड़े ।

रहबर-पैगम्बर गीतों के अब नहीं रहे
वे तहख़ाने थे जिनको हमने खोला ।
घायल उड़ान के संशय तोड़े हैं भरसक
गीले पँखों को खुली हवा में तोला ।

सम्वेदन सारे सृजनकर्म की कुञ्जी है
अनुभव, अनुभूति बने, इसका रस पीके ।
चेतना जिसे जोड़े समाजसन्दर्भों से
प्रक्रियाएँ सब देखीं गीतों ने जीके ।

प्राधान्य रहा जो हम व्यक्तिचेतना का
सब रागमयी अनुभव का किया कराया ।
हालातों से हालत की अनबन बनी रही
दुख के पहाड़ को तिल-तिल कर सरकाया ।

आवेश क्रोध के कल्मष को धोकर हमने
यह नई बुनाई गीतों में है डाली ।
अपने स्वभाव का पूरा रस लेना न बुरा
मानुष-सच की यह सनद नहीं है जाली ।

सँघर्ष समन्वय से स्वाभाविक हल मिलते
कविता की कुछ तो अपनी संस्कृति होती ।
समधर्मी बन्धु-बान्धवों में एका होता
धारा कोई भी होती बड़ी न छोटी ।

मरुथल को जँगल, जँगल को जीने लायक
किस मुश्किल से कर पाई, और करेगी ।
यह गीति-प्रजाति बची आस्था का सुफल लिए
जातीय अस्मिता इसकी नहीं मरेगी ।

जिन परम्पराओं से छन कर आई कविता
अधुनातन भावबोध नवता के लेखे ।
वे रँग, गीत में अनुप्राणित होकर फूटे
वे रँग, गीत ने जिए मौज़ ले-लेके ।

मूल्यान्ध दशा का रेखाँकन-विश्लेषण कर
जो नई अर्थ-मीमांसा लेकर आए ।
वे समालोचना के काव्यार्थ कहाँ खोए
वे मूल्यबोध के हिरने कहाँ हिराए ।

आलोचन का मरना, गीतों की मौत नहीं
आशा का दृढ़ आधार खड़ा हम करते ।
अपनी ज़मीन की उर्वरता का देय लिए
कविता में ज़िन्दा होने का दम भरते ।