क्या मुमकिन है
कि मैं मुझसे छिटक जाऊँ
तुम तुमसे...
न पैरहन में सिलवटों की फ़िक्र हो
न लम्हों के दायरों का होश रहे...
न गलियारों में कोई साये हों
न मंजिलों की तलाश रहे...
बस तुम रहो और मैं रहूँ
बेसबब और
बेशुमार...
क्या मुमकिन है
कि मैं मुझसे छिटक जाऊँ
तुम तुमसे...
न पैरहन में सिलवटों की फ़िक्र हो
न लम्हों के दायरों का होश रहे...
न गलियारों में कोई साये हों
न मंजिलों की तलाश रहे...
बस तुम रहो और मैं रहूँ
बेसबब और
बेशुमार...