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कितना दुखद है / शैलजा पाठक

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कितना दुखद है
पांच फूल
पांच फल
पांच रंग
पांच चिड़िया
का नाम पूछो
तो बच्चा रोटी बोले
शहरो के नाम पर
टेढ़ी पीठ पर गाँव का बंजर ढोने लगे
बच्चा सो रहा हो
पर बाप चेहरा देख रोने लगे
एक नन्ही हथेली हमारे कार का शीशा धोने लगे
पसरी हथेली पर सिक्के भर भूख हम छोड़ जाएँ
कितना दुखद है न
ये बच्चे अचानक गायब हो जायँ
कोई आँख भर आंसू भी न भरे
जिन्हें जिंदगी भी न मिली
उनका अंतिम संस्कार भी कोई क्यों करे
कितना दुखद हैं
बड़ी झालरों की दूकान के बाहर
जलती धूप में
नन्ही सी लड़की मिट्टी के दीये लिए जले
दुःख तो इतने कि आँख भी न मिला पाऊं
तो बस मन को भरमाते हैं
प्रेम लिखते ही पूरब सोने सा चमक उठा
परिन्दे आकाश नांप रहे
मैं जानती हूँ झूठी मुस्कराहट की चुभन
अपने ही भरम पर
भरी आँख में बून्द बून्द झालर काँप रहे...