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किसी के हुस्न का नक्शा मुझे कामिल नहीं मिलता / अजय अज्ञात

किसी के हुस्न का नक़्शा मुझे कामिल नहीं मिलता
जो दर्दे-दिल मुझे दे दे वो दर्या दिल नहीं मिलता

ज़माने में हसीनों की कमी तो है नहीं फिर क्यूँ
दिले-मुज़्तर को तोहफ़े में किसी का दिल नहीं मिलता

किसी की बद दुआओं का असर है या हूँ बदक़िस्मत
मुझे कोई भी मेरे प्यार के क़ाबिल नहीं मिलता

गिरफ़्ताज़न हैं सारे ही अना को ढोये फिरते हैं
मिलें क्या ऐसे लोगों से कि जिनसे दिल नहीं मिलता

अजय ‘अज्ञात’ कब सब का मुक़द्दर इक-सा होता है
बहुत सी ऐसी लहरें हैं जिन्हें साहिल नहीं मिलता