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किस कदर गर्म है हवा देखो / हंसराज 'रहबर'

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किस कदर गर्म है हवा देखो,
जिस्म मौसम का तप रहा देखो ।

बदगुमानी-सी बदगुमानी है,
पास होकर भी फ़ासला देखो ।

वे जो उजले लिबास वाले हैं,
उनकी आँखों में अज़दहा[1] देखो ।

हो अंधेरा सफ़र, सफ़र ठहरा,
ले के चलते हैं हम दिया देखो ।

खेलता है जो मौत से होली,
क्या करेगा वो मनचला देखो ।

अम्न ही अम्न सुन लिया, लेकिन,
मक़तलों का भी सिलसिला देखो ।

इस ज़माने में जी लिया 'रहबर'
मर्दे-मोमिन[2] का हौसला देखो ।

रचनाकाल : 01 मई 1980, दिल्ली

शब्दार्थ
  1. अजगर
  2. साहसी पुरुष